राष्ट्रीय जनता दल की नेता और लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोशल मीडिया सक्रियता पर जोरदार हमला बोला है। पीएम मोदी के इंस्टाग्राम रील्स और कंटेंट-संचालित प्रचार पर तंज कसते हुए रोहिणी ने कहा कि देश रीलों और कैमरों के फिल्टर से नहीं, बल्कि जिम्मेदार फैसलों और जनहित के कार्यों से चलता है। सोशल मीडिया पर एक लंबी पोस्ट साझा करते हुए रोहिणी आचार्य ने प्रधानमंत्री के काम करने के तरीके और प्राथमिकताओं पर कई गंभीर सवाल उठाए।
मन की बात के बाद अब रील की बात
रोहिणी आचार्य ने तंज कसते हुए लिखा कि लगता है प्रधानमंत्री मोदी को इंस्टाग्राम रील बनाने की नई लत लग गई है। अब उन्हें हर मुद्दे का जवाब काम से देने के बजाय इंस्टाग्राम के कैमरे से देना ज्यादा रास आ रहा है। पहले ‘मन की बात’ होती थी, अब ‘रील की बात’ हो रही है। ऐसा लगता है कि देश को उबाने के बाद अब पीएम खुद भी अपनी ‘मन की बात’ से ऊब चुके हैं।
जनता को फिल्टर नहीं, रोजगार और समाधान चाहिए
देश की वर्तमान समस्याओं का जिक्र करते हुए राजद नेता रोहिणी आचार्या ने कहा कि देश का युवा आज सड़कों पर उतरकर अपने हक और रोजगार के लिए संघर्ष कर रहा है, जबकि प्रधानमंत्री कैमरे का सही एंगल तलाशने में व्यस्त हैं। उन्होंने आगे लिखा कि जनता को रोज नई रील नहीं, बल्कि स्थाई रोजगार चाहिए। लोगों को मोबाइल कैमरे के फिल्टर की नहीं, बल्कि जमीनी समस्याओं के समाधान की दरकार है। देश को आत्ममुग्ध प्रवचन और प्रचार नहीं, सरकार की जवाबदेही चाहिए।
काम कम, कंटेंट ज्यादा — सरकार की नई नीति?
प्रधानमंत्री कार्यालय और पीएम की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हुए रोहिणी ने कहा कि पीएम का समय अब पीएमओ से ज्यादा अब इंस्टाग्राम पर बीत रहा है। रीलों की रफ्तार तो बहुत तेज है, लेकिन जनता के सवालों पर सरकार की जवाबदेही की गति बेहद धीमी है। उन्होंने तीखा कटाक्ष करते हुए कहा कि, “प्रधानमंत्री जी, आप अपनी सरकार का नया मंत्र ही घोषित कर दीजिए— काम कम, कंटेंट ज्यादा।
शासन का मूल्यांकन लाइक्स और व्यूज से नहीं होता
कैमरे के सामने और पीछे की सक्रियता में अंतर बताते हुए रोहिणी आचार्य ने कहा कि कैमरा ऑन होते ही प्रधानमंत्री की सक्रियता दिखने लगती है, लेकिन कैमरा ऑफ होते ही देश की आवाज पर खामोशी छा जाती है। अपनी बात समाप्त करते हुए उन्होंने कहा कि, क्या इस नई रील नीति के दम पर ही देश को विश्वगुरु बनाने का दंभ भरा जा रहा है? देश को सही दिशा देने वाली नीतियों की जरूरत है, रीलों की नहीं। शासन का मूल्यांकन सोशल मीडिया के लाइक्स और व्यूज से नहीं, बल्कि जमीनी काम और नतीजों से होता है—यह बात शायद आपकी समझ में कभी नहीं आने वाली।

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