देशभर में चल रहे छात्र आंदोलनों पर पुलिस और प्रशासन के द्वारा छात्रों पर की जा रहे लाठीचार्ज, उनकी गिरफ्तारियों तथा बिहार में छात्रों पर घोषित इनामों के विरोध में बक्सर से राजद सांसद सुधाकर सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा है। उन्होंने आंदोलित छात्रों पर पुलिस फायरिंग की उच्चस्तरीय न्यायिक जांच कराने, दर्ज मुकदमों को वापस लेने, घोषित इनामों को निरस्त करने और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए तत्काल केंद्रीय हस्तक्षेप की मांग की है।
छात्रों को अपराधी की तरह देखना लोकतांत्रिक व्यवस्था पर आघात
पत्र में सांसद सुधाकर सिंह ने कहा है कि दिल्ली और बिहार सहित देश के विभिन्न हिस्सों से जो प्रशासनिक रवैया सामने आया है, उसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विधि के शासन पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। उन्होंने कहा है कि यदि देश का युवा अपने सुनहरे भविष्य, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली और शिक्षा से जुड़े गंभीर मुद्दों पर आवाज उठाता है, तो उसे अपराधी की भांति प्रताड़ित करना तानाशाही मानसिकता का प्रतीक है। दिल्ली में पुलिस द्वारा किया गया लाठीचार्ज, छात्राओं के साथ दुर्व्यवहार और बिहार के जहानाबाद में छात्रों पर गोली चलाए जाने जैसी घटनाएं अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण हैं।”
इनाम और पोस्टर की राजनीति पर तीखा प्रहार
राजद सांसद सुधाकर सिंह ने बिहार सरकार द्वारा प्रदर्शनकारी छात्रों की पहचान बताने पर दस हजार रुपए का इनाम घोषित करने और सार्वजनिक स्थानों पर उनके पोस्टर चिपकाने के फैसले की कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा कि जिस बिहार की ऐतिहासिक पहचान सामाजिक न्याय और जनआंदोलनों से रही है, वहां छात्रों को सार्वजनिक रूप से कलंकित करना भय का माहौल पैदा करता है। बिना किसी कानूनी साक्ष्य के निर्दोष विद्यार्थियों के पोस्टर जारी करने से उनका शैक्षणिक और व्यावसायिक भविष्य अधर में लटक जाएगा।
सरकार के सामने रखी कुल 8 प्रमुख मांगें
सांसद सुधाकर सिंह ने सरकार के सामने कुल 8 प्रमुख मांगें रखीं। उनकी पहली मांग थी कि दिल्ली और बिहार समेत देशभर में हुए छात्र आंदोलनों पर पुलिस कार्रवाई, अवैध गिरफ्तारियों और दमनकारी नीतियों की जांच हेतु सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र न्यायिक जांच आयोग गठित किया जाए।
दूसरी मांग यह थी कि जहानाबाद में पुलिस फायरिंग की उच्चस्तरीय जांच हो। संविधान के अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करने वाले दोषी अधिकारियों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाए। अवैध रूप से हिरासत में लिए गए या नजरबंद किए गए सभी विद्यार्थियों को बिना शर्त तुरंत रिहा किया जाए और मनमानी गिरफ्तारियों पर रोक लगे। छात्रों पर दर्ज किए गए सभी आपराधिक मामले और प्राथमिकी तत्काल प्रभाव से निरस्त किए जाएं, ताकि उनका शैक्षणिक व व्यावसायिक भविष्य सुरक्षित रहे।
तीसरी मांगों में अत्यधिक बल प्रयोग करने वाले दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त विभागीय व कानूनी कार्रवाई की मांग है। चौथी मांग यह थी कि छात्राओं के साथ दुर्व्यवहार, गरिमा के हनन या यौन उत्पीड़न में शामिल पुलिसकर्मियों को तुरंत सेवा से बर्खास्त कर जेल भेजा जाए। पांचवीं मांग यह है कि छात्रों पर घोषित वित्तीय इनाम को रद्द किया जाए और सार्वजनिक रूप से लगाए गए पोस्टरों को तुरंत हटाया जाए। अगली मांग जब्ती, लाठीचार्ज और नजरबंदी सहित पुलिस द्वारा उठाए गए सभी प्रशासनिक कदमों की समीक्षा हेतु निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने की है।
असहमति अपराध नहीं है
सांसद ने अपने पत्र का समापन करते हुए कहा कि लोकतंत्र में असहमति को अपराध नहीं माना जा सकता। सरकार का प्राथमिक दायित्व नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना है। यदि सरकार लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने में असमर्थ है, तो नैतिक आधार पर उसे अपने पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है और पूरी सरकार को त्यागपत्र दे देना चाहिए।

Leave feedback about this